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युग प्रवर्तक श्री अरूट जी महाराज

अरोड़ वंश के इतिहास के पौराणिक साक्ष्य उपलब्ध है । अरोड़ वंशी श्री अरूट जी महाराज के वंशज होकर श्रेष्ठ क्षत्रिय एवं सूर्यवंशी हैं । इस तथ्य का उल्लेख भविष्य पुराण, जगत प्रसंग अध्याय 15 में किया गया है । भगवान श्री राम के पुत्र श्री लव लाहौर के राजा थे । क्षत्रिय राजाओं के वंश में तत्समय पुरूषों की बहुविवाह की प्रथा को सामाजिक मान्यता प्राप्त थी । इस प्रथा के मूल में राज्यों की सुरक्षा व उनके विस्तार का कूटनीतिक महत्व निहित था । राजा श्री कालराय की भी दों रानियों थी ।

श्री कालराय की प्रथम पत्नी के पुत्र अत्यंत शांत स्वभाव के होकर आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे । वह क्रोध, नाराजगी व रूठने से बहुत दूर रहते थे । रूद्र शब्द क्रोध, रूठने व नाराजगी से संबंधित है, जिसका तद्भव रूप ‘रूट’ कहलाता था । रानी के पुत्र के स्वभाव के अनुरूप ही वह ‘अरूट’ कहलाने लगे, जिसका अर्थ होता है क्रोध, अहंकार व ईर्ष्या का जिसमें अभाव हो अथ श्री अरूट जी महाराज जन्म से क्षत्रिय थे, परन्तु बालपन से ही उनमें संतो के गुण भी मौजूद थे । श्री अरूट जी महाराज को बड़ा पुत्र होने पर भी लाहौर का उत्तराधिकारी छोटी रानी के पुत्र को बनाया, परन्तु राज्य का सारा खजाना श्री अरूट जी महाराज को दिया । श्री अरूट जी महाराज तब कुछ सैनिकों व नागरिकों सहित मुलतान की ओर प्रस्थान कर गये । इस प्रकार श्री अरूट जी महाराज के बेड़े में साथ जाने वाले लोग ‘अरोड़ वंशी’ कहलाये । श्री अरूट जी महाराज के कारवां में साथ जाने वाले लोगों ने व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से खजाने में वृद्धि की तथा साथ आने वाले सैनिकों की मदद से श्री अरूट जी महाराज ने बिना हिंसा के राज्य भी स्थापित किया । सिधुं नदी के किनारे अन्य राजाओं की भांति एक किला भी बनाया, जिसे अरोड़कोट कहा जाता है ।

अरबों का भारत पर आक्रमण 8 वीं सदी में हुआ था । अरबों के आक्रमण से पूर्ण अरोड़वंश की राजधानी “अरोड़ा” शहर में स्थित थी । इस शहर पर कालान्तर में वर्ष 711 ई. में अरब शासक मुहम्मद बिन कासिम ने आधिपत्त्य कर लिया था । अरब इतिहासकारों ने अपने ग्रन्थो में इस शहर का उल्लेख “अल-रोर” के रूप में किया है। आज भी इस शहर का प्राचीन स्मारक आलमगीर मस्जिद के अवशेष स्थित है । वर्ष 962 में एक भंयकर भूकम्प के कारण सिन्दु नदी के प्रवाह की दिशा में परिवर्तन के कारण इस शहर की इमारते व घर लगभग नष्ट हो गये । तत्कालीन शासकों ने तब इस शहर की पुनः स्थापना यहाँ से लगभग 10 कि.मी. दुर सिन्धु नदी के मुहाने पर की जो अब भी “रोहरी” व के नाम से जाना जाता है ।

श्री अरूट जी महाराज, अरोड़वंश के इतिहास व संबंधित स्थानों का आज भी पाकिस्तान में अत्यन्त महत्व व सम्मान है। इस सम्मान को अभिव्यक्त करने के लिये वर्तमान सुक्कुर जिले के रोहरी शहर के पास पाकिस्तान के सिन्ध की राज्य सरकार ने सरकारी क्षे, में “The Aror University of Art’ Architecture Design and Herritage” स्थापना की है । सिन्ध की विधानसभा व केबिनेट ने भी इसे वर्ष 2018 में मजूरी दी है ।

श्री अरूट जी महाराज पूर्णतः समन्वयवादी थे । उनकी शिक्षाओं में आदि पुरूष श्री शंकराचार्य के समन्वयवाद की झलक मौजूद है । श्री अरूट जी महाराज की शिक्षा में सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा को प्रमुखता प्रदान की गई है । उनका संदेश था कि अपनी उन्नति के लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिये व इसके साथ ही समाज के विकास में भी सदैव तत्पर रहना चाहिये । श्री अरूट जी महाराज की इन शिक्षाओं को मात्र साधारण व्यावहारिक मार्गदर्शन नहीं माना जा सकता है । इसके मूल में गंभीर दर्शन व्याप्त है , जिसकी व्याख्या निम्न प्रकार से की जा सकती है :

सृष्टि के प्रत्येक तत्व का एक मूल आंतरिक स्वरूप होता है । जैसे- शक्कर सदैव मीठी होती है, नमक सदैव खारा होता है । उसी प्रकार मनुष्य का मूल स्वरूप “चैतन्य” है । इस चेतना के कारण ही मनुष्य अन्य सभी प्राणियों से उत्कृष्ट है व इसी कारण से वह संसार में उपलब्ध सभी भौतिक साधनों व अन्य जीवों को नियंत्रित करता है । चेतना सृष्टि के तत्व “अग्नि” से उत्पन्न होती है । अग्नि का प्रवाह सदैव नीचे से ऊपर प्रवाहित होता है । हम जानते है कि जड़ तत्वों का प्रवाह सदैव ऊपर से नीचे होता है परन्तु चैतन्य (अग्नि) सदैव नीचे से ऊपर प्रवाहित होती है । इसी प्रवृत्ति के कारण मनुष्य भी सदैव नीचे से ऊपर की ओर अग्रसर होना चाहिये अर्थात् उसे अपने जड़त्व को नियंत्रित कर सदैव उन्नति करनी चाहिये।

मनुष्य अपने से ऊपर उठता है तो सर्वप्रथम उसे परिवार का कल्याण करना चाहिये । परिवार सामाजिक व्यवस्था की एक इकाई है । यदि सभी परिवारों की उन्नति होगी तो समाज की स्वतः उन्नति होगी । मनुष्य को लगातार अपने से ऊपर उठते हुए परिवार, समाज व फिर देश की उन्नति के लिये लगातार प्रयत्नशील रहना चाहिये ।

अतः इस प्रकार श्री अरूट जी महाराज के संदेश में पूर्णतयाः समन्वयवाद व आदि गुरू शंकराचार्च के अद्वैत्वाद की झलक स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है । श्री अरूट. जी महाराज की कथनी व करनी में कोई अंतर नहीं था । श्री कालराय के बड़े पुत्र होने के बाद भी उन्होंने अपने पिता के निर्णय का आज्ञापूर्वक पालन करके अपने छोटे भाई से समन्वय बनाये रखा । उनके बेड़े में साथ चलने वाले नागरिकों को व्यावसायिक व कृषि संबंधित गतिविधियों में लगाये रखा व राजकीय खजाने में वृद्धि की, वहीं साथ चलने वाले सैनिकों की संख्या व उनके कल्याण का भी पूर्ण ध्यान रखा । महाराजा श्री अरूट जी की सेना के सैनिक भी महान प्रतापी थे । प्लिनी, जो रोम के साहित्यकार व दार्शनिक थे, उनके द्वारा भी सिंकदर के सैनिकों को श्री अरूट जी महाराज के सैनिकों के युद्ध का अपने साहित्य में उल्लेख किया है ।

वर्तमान में जिस प्रकार समाज, राष्ट्र व विश्व का ध्रुवीकरण जातियों, नस्लों को धुरी बनाकर किया जा रहा है , यह अत्यंत ही चिंता का विषय है । इस समस्या का निराकरण श्री अरूट जी महाराज के समन्वयवाद में निहित है । उनकी शिक्षाओं का पालन करके ही विश्व-बंधुत्व के आदर्श लक्ष्य की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है ।

उल्लेखनीय है कि मर्यादा पुरूषोत्त श्रीराम सूर्यवंशी क्षत्रिय थे । श्री कालराय श्री लव के वंश से थे , अतः अरोड़ा समाज के व्यक्तियों को भगवान श्रीराम के वंशज होने का सौभाग्य प्राप्त है । श्री अरूट जी महाराज श्री राम के आठवें वंशज थे । श्री अरूट जी महाराज के साथ जाने वाले सभी सदस्य अरोड़ा क्षत्रिय कहलाये गये। “क्षत्रिय” शब्द का तद्भव रूप “खत्री” है क्योंकि पंजाब प्रान्त में “क्षत्रिय” शब्द को “खत्री” उच्चारित किया जाता था । अरोड़ा क्षत्रिय भी क्षत्रिय ही है । अतः अरोड़ा व खत्री समुदाय के एक ही मूल पुरूष श्री रामजी के वंशज श्री कालराय जी है । कालान्तर में विभिन्न मतभेदों व संकुचित कारणों से “खत्री” अपने आपको “अरोड़ा” से पृथक समुदाय मानने लगे ।

“अरोड़ा” व “खत्री” एक ही मूल पुरूष की सन्ताने है । श्री अरूट जी महाराज का पूर्णतः समन्वयवादी दृष्टिकोण था । अतः उनके दृष्टिकोण के अनुरूप “अरोड़ा” समुदाय “खत्री” समुदाय से भिन्न नहीं है । हमें श्री अरूट जी महाराज के उपदेशों का अनुसरण करते हुए पूर्ण समन्वयवादी दृष्टिकोण रखते हुए एक ही क्षत्रिय समाज की एकता के अनुरूप कार्य करना चाहिये ।

(नोट:- उक्त रचना श्री अरूट जी महाराज के बारे में पूर्व उपलब्ध जानकारी व उनकी शिक्षाओं की दार्शनिक व्याख्या पर आधारित है, जिसका उद्देश्य सामाजिक कल्याण व चेतना है।)

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